Thursday, January 21, 2016

उत्तराखण्ड खाला का घर बन गया, जो मर्जी आये करो


         तीन दिन पहले प्रदेश के मुख्य मंत्री हरीश रावत और काबिना मंत्री हरकसिंह रावत के बयान सामने आये। मुख्य मंत्री ने राज्य की आर्थिक स्थिति पर बयान दिया कि जब जरुरतमंद उनके पास मांगने आते हैं तो उनकी इच्छा अपने बाल नाचने की होती है।  यह राज्य की अर्थव्यवस्था का सच है जो मुख्यमंत्री द्वारा खींज में ही सही उद्घाटित हुआ है।
      दूसरा बयान  काबिना मंत्री हरकसिंह रावत का है जो कहते हैं कि वे अपने दम पर राजनीति में हैं और किसी की कृपा से नहीं। वे आजकल गैरसैंण राजधानी को लेकर लगातार दे रहे बयानों से चर्चा में हैं।
 जहां तक मुख्य मंत्री का सवाल है राज्य की अर्थव्यवस्था को अच्छी तरह जानने के बावजूद उनके राजसी खर्चे कम नहीं हुए हैं। लगातार हैलीकाॅप्ट उडान भर रहे हैं, घोषणाऐं हो रही हैं और लाल बत्तियां बट रही हैं। जिस मुख्य सचिव को अपना  मुख्य प्रधान सचिव जैसा नया पद सृजित कर अब राजस्व परिषद् का अध्यक्ष बना दिया गया है उनके बारे में लोग जानते हैं कि सहत्रधारा से जौलीग्राॅट आने तक भी उन्हें हैलीकांप्टर चाहिए। आप भी राजा नही हैं जो खाता बही के बिना अपने को ही सही मानें। संविधान ने एक-एक पैसे के लिए सदन को अधिकार दिया है और उसका बजट पेस व पास होता है।
        उत्तराखण्ड राज्य बनने से पहले तीन लाल बत्तियों के अलावा चैथी नही थी। पर्वतीय विकास परिषद्, कुमाऊं और गढवाल विकास निगमों के अध्यक्षों को। उत्तराखण्ड राज्य क्या बना खाला का घर बन गया। 250-300 लाल बत्तियां बटने लगी। रोज और बेहिसाब दौरे , उसी हिसाब से घोषणाऐं और घोषणाऐं। सब जानते हैं उत्तराखण्ड के पास सीमित संसाधन हैं। सरकारी खर्च घटाकर ही संतुलन बनाया जा सकता है लेकिन आप सहित जितने भी मुख्य मंत्री- मंत्री हुए उनकी फिजूलखर्ची जगजाहिर है। नौकर शाही बेलगाम है ऐसे में आज  नही भी तो कल आपको ही क्या पूरे उत्तराखण्ड दिवाला निकलना ही है।
 दूसरा हरक सिंह रावत का बयान दम्भ पर आधारित है। लोकतंत्र अपने दम का नही जनता के दम का होता है। ये अलग बात है कि हमारे लोकतंत्र में जनता की औकात केवल वोट तक सिमट गयी है और ऐन-केन प्रकारेण वोट ले लो तब तुम राजा हो गये। जनअपेक्षाओं की परवाह किए बिना अपनी चलाना लोकतंत्र की भावनाओं से खिलवाड है। उत्तराखण्ड राज्य परिकल्पनाओं से जिनका वास्ता ही न हो, और घूम-फिर कर सत्ता उनके चक्कर काटे तो उनका दम्भी हो जाना आश्चर्य नही पैदा करता।
       ये उत्तराखण्ड का सच है कि 15 सालों में राज्य अवधारणा को रोंदा गया। कांग्रेस, भाजपा और उनके साथ लगातार सत्ता में रहा उत्तराखण्ड क्रांति दल इस सब के लिए जिम्मेदार हैं, कुर्सी चुनाव चिन्ह की लडाई एक धडा जीत भले ही ले उत्तराखण्ड का भला होने वाला नही है। लोक का जगना आवश्यक है, तभी दम्भी राजनीति से मुक्ति पायी जा सकती है। 

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